नवरात्रि: माँ अम्बे के नौ दिवसीय उत्सव दर्शन

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या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नमस्कार !!! मैं हूँ ट्रेवल विथ लतिका से,लतिका कपूर और सर्वप्रथम आप सभी को मेरी ओर से शारदीय नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें।माँ दुर्गा की आराधना का महापर्व नवरात्रि का आरंभ हो चुका है,शरद नवरात्रि नौ दिवसीय हिंदू त्यौहार है जो देवी दुर्गा और हिंदू धर्म में उनके कई रूपों को समर्पित है।नवरात्रि का नौ दिवसीय त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है – देवी दुर्गा के आशीर्वाद से धर्म अधर्म पर विजय प्राप्त करता है।इस त्यौहार का बहुत महत्व है क्योंकि यह हिंदू धर्म में देवी माँ को समर्पित सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। तो चलिए आज हम माँ अम्बे के नौ भव्य रूपों का दर्शन करते हैं।

शैलपुत्री

माँ दुर्गा का पहला ईश्वरीय स्वरुप शैलपुत्री है| शैल का अर्थ है शिखर| शास्त्रों में शैलपुत्री को पर्वतराज की बेटी के नाम से जाना जाता है।आमतौर पर यह समझा जाता है कि देवी शैलपुत्री कैलाश पर्वत की पुत्री है।

इस दिन घटस्थापना के बाद माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का पूजन, अर्चन किया जाता है। शैल का अर्थ है हिमालय और पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। बैल इनका वाहन होने के कारण इन्हें वृषभारूढा के नाम से भी जाना जाता है। इनके दाएं हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में इन्होंने कमल धारण किया हुआ है। माँ शैलपुत्री का पूजन और स्तवन निम्न मंत्र से किया जाता है।

वन्दे वांछितलाभाय, चंद्रार्धकृतशेखराम्‌।
वृषारूढां शूलधरां, शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌

ब्रह्मचारिणी

दूसरे दिन माँ अम्बे के ‘देवी ब्रह्मचारिणी’ रूप की पूजा करने का विधान है। माँ ब्रह्मचारिणी के दाएं हाथ में माला और बाएं हाथ में कमण्डल है। शास्त्रों में बताया गया है कि माँ अम्बे ने पार्वती के रूप में पर्वतराज के यहां पुत्री बनकर जन्म लिया और महर्षि नारद के कहने पर अपने जीवन में भगवान महादेव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। हजारों वर्षों तक अपनी कठिन तपस्या के कारण ही इनका नाम तपश्चारिणी या ब्रह्मचारिणी पड़ा। अपनी इस तपस्या की अवधि में इन्होंने कई वर्षों तक निराहार रहकर और अत्यन्त कठिन तप से महादेव को प्रसन्न कर लिया।

दधाना करपद्माभ्याम्, अक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि, ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

चंद्रघंटा

तीसरे दिन माँ अम्बे के तीसरे रूप चंद्रघंटा देवी के वंदन, पूजन और स्तवन करने का विधान है। इन देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्ध चंदंमा विराजमान है इसीलिये इनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। इस देवी के दस हाथ माने गए हैं और ये खड्ग आदि विभिन्न अस्त्र और शस्त्र से सुसज्जित हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी के इस रूप की पूजा करने से मन को अलौकिक शांति प्राप्त होती है ।

पिंडजप्रवरारूढा, चंडकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं, चंद्रघंटेति विश्रुता।।

कूष्मांडा

चौथे दिन माँ अम्बे के चतुर्थ स्वरूप माँ कूष्मांडा की पूजा और अर्चना की जाती है। माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व जब चारों ओर अंधकार था तो माँ अम्बे ने इस अंड यानी ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी कारण उन्हें कूष्मांडा कहा जाता है। सृष्टि की उत्पत्ति करने के कारण इन्हें आदिशक्ति नाम से भी अभिहित किया जाता है। इनकी आठ भुजाएं हैं और ये सिंह पर सवार हैं। सात हाथों में चक्र, गदा, धनुष, कमण्डल, कलश, बाण और कमल है।

सुरासंपूर्णकलशं, रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां, कूष्मांडा शुभदास्तु मे।।

स्कंदमाता

पांचवे दिन माँ अम्बे के पांचवें स्वरूप माँ स्कंदमाता की पूजा और अर्चना की जाती है। स्कंद शिव और पार्वती के दूसरे और षडानन (छह मुख वाले) पुत्र कार्तिकेय का एक नाम है। स्कंद की माँ होने के कारण ही इनका नाम स्कंदमाता पड़ा। मां के इस रूप की चार भुजाएं हैं और इन्होंने अपनी दाएं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद अर्थात कार्तिकेय को पकड़ा हुआ है और इसी तरफ वाली निचली भुजा के हाथ में कमल का फूल है। बाईं ओर की ऊपर वाली भुजा में वरद मुद्रा है और नीचे दूसरा श्वेत कमल का फूल है। सिंह इनका वाहन है। क्योंकि यह सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं इसलिये इनके चारों ओर सूर्य सदृश अलौकिक तेजोमय मंडल सा दिखाई देता है।

सिंहासनगता नित्यं, पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी, स्कंदमाता यशस्विनी।।

कात्यायनी

छठे दिन माँ अम्बे के छठे स्वरूप माँ कात्यायनी की पूजा और अर्चना की जाती है। ऐसा विश्वास है कि इनकी उपासना करने वाले को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति हो जाती है। क्योंकि इन्होंने कात्य गोत्र के महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री रूप में जन्म लिया, इसीलिये इनका नाम कात्यायनी पड़ा। इनका रंग स्वर्ण की भांति अन्यन्त चमकीला है और इनकी चार भुजाएं हैं। दाईं ओर के ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में है और नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में खड्ग अर्थात् तलवार है और नीचे वाले हाथ में कमल का फूल है।

चंद्रहासोज्ज्वलकरा, शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यात्, देवी दानवघातनी।।

कालरात्रि

सातवें दिन माँ अम्बे के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि की पूजा और अर्चना का विधान है। इनका वर्ण अंधकार की भांति एकदम काला है। बाल बिखरे हुए हैं और इनके गले में दिखाई देने वाली माला बिजली की भांति देदीप्यमान है। इन्हें तमाम आसुरिक शक्तियों का विनाश करने वाला बताया गया है। इनके तीन नेत्र हैं और चार हाथ हैं जिनमें एक में खड्ग अर्थात् तलवार है तो दूसरे में लौह अस्त्र है, तीसरे हाथ में अभयमुद्रा है और चौथे हाथ में वरमुद्रा है। इनका वाहन गर्दभ अर्थात् गधा है।

एकवेणी जपाकर्ण, पूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी, तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोह, लताकंटकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा, कालरात्रिभयंकरी।।

महागौरी

आठवें दिन माँ अम्बे के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की पूजा और अर्चना का विधान है। जैसा कि इनके नाम से ही स्पष्ट है कि इनका वर्ण पूर्ण रूप से गौर अर्थात् सफेद है। इनके वस्त्र भी सफेद रंग के हैं और सभी आभूषण भी श्वेत हैं। इनका वाहन वृषभ अर्थात् बैल है और इनके चार हाथ हैं। इनका ऊपर वाला दाहिना हाथ अभयमुद्रा में है और नीचे वाले हाथ में त्रिशूल है। बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में डमरू है और नीचे वाला हाथ वरमुद्रा में है। ऐसा वर्णन मिलता है कि भगवान् शिव को पतिरूप में पाने के लिये इन्होंने हजारों सालों तक कठिन तपस्या की थी जिस कारण इनका रंग काला पड़ गया था लेकिन बाद में भगवान् महादेव ने गंगा के जल से इनका वर्ण फिर से गौर कर दिया।

श्वेते वृषे समारूढा, श्वेताम्बरधरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यात्, महादेवप्रमोददाद।।

सिद्धदात्री

नौवें दिन माँ अम्बे के नौवें स्वरूप माँ सिद्धदात्री की पूजा और अर्चना का विधान है। जैसा कि इनके नाम से ही स्पष्ट हो रहा है कि सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली देवी हैं माँ सिद्धिदात्री। इनके चार हाथ हैं और ये कमल पुष्प पर विराजमान हैं। वैसे इनका वाहन भी सिंह ही है। इनके दाहिनी ओर के नीचे वाले हाथ में चक्र है और ऊपर वाले हाथ में गदा है। बाईं ओर के नीचे वाले हाथ में कमल का फूल है और ऊपर वाले हाथ में शंख है। प्राचीन शास्त्रों में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, और वशित्व नामक आठ सिद्धियां बताई गई हैं। ये आठों सिद्धियां मां सिद्धिदात्री की पूजा और कृपा से प्राप्त की जा सकती हैं। हनुमान चालीसा में भी ‘अष्टसिद्धि नव निधि के दाता’ कहा गया है।

सिद्धगंधर्वयक्षाद्यै:, असुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात्, सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

इस उत्सव की शुरुआत घटस्थापना से होती है। जैसा कि नाम से पता चलता है, इस दिन घर में देवी अम्बे की छवि वाला एक बर्तन या कलश स्थापित किया जाता है। मटके या कलश में पानी भरकर गाय के गोबर से ढक दिया जाता है और गोबर पर बीज बो दिए जाते हैं। गमले को रेत की क्यारी पर रखा जाता है और इस पर बीज भी बोए जाते हैं।

बर्तन पर विशेष पूजा की जाती है और प्रतिदिन पानी का छिड़काव किया जाता है। जिस कमरे में कलश रखा जाता है उसे दशईं घर कहते हैं। विजयादशमी के दिन पौधे के कई बेड बनाए जाते हैं। इस पौधे को ‘जमारा’ के नाम से जाना जाता है और इसे देवी दुर्गा का आशीर्वाद माना जाता है।

सिंदूर तृतीया 9 दिवसीय नवरात्रि उत्सव के तीसरे दिन मनाई जाती है। इस दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन का उत्तर भारत में बहुत महत्व है।

यह नवरात्रि के दौरान एक अनुष्ठान है, जो सिंदूर के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है – लाल पाउडर या सिंदूर – जो हिंदू अनुष्ठान का एक अनिवार्य हिस्सा है और देवी माँ की पूजा के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है।

यह दिन नवरात्रि के पहले तीन दिनों के अंत का भी प्रतीक है, खासकर दक्षिण भारत में। नवरात्रि के पहले तीन दिन यहां देवी दुर्गा को समर्पित हैं। अगले तीन दिन देवी लक्ष्मी को समर्पित हैं।

माँ बम्बलेश्वरी देवी मंदिर- डोगरगढ़

छतीसगढ़ के डोगरगढ़ रेलवे स्टेशन के पास स्थित पर्वत की 1600 फीट की ऊँचाई पर मां बम्बलेशवरी देवी मंदिर मुख्य रूप से मां बगलामुखी को सर्मपित है। यह मंदिर छतीसगढ़, मध्यप्रदेश एवं उत्तरी महाराष्ट्र के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। वर्ष में पड़ने वाले दोनों ही नवरात्रों का त्यौहार यहाँ बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। विजयदशमी के दिन भी यहाँ भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है।

हरी-भरी वादियों के बीच झील किनारे स्थापित यह मंदिर लगभग 2200 साल पुराना है। प्राचीनकाल में इस नगर का नाम कामावती था। स्थानीय लोगों के अनुसार कामावती नगर के तत्कालीन राजा वीरेनसेन ने अपने पुत्र मदनसेन के जन्म की खुशी में इस मंदिर निर्माण करवाया था। इस मंदिर के दर्शन के लिए आपको 1100 सीढियाँ चढ़नी होगी। सीढियाँ ना चढ़ पाने वाले श्रद्धलुओं के लिए यहाँ ‘रोप वे’ यानी केबल कार की स: शुल्क सुविधा उपलब्ध है।

मंदिर में स्थापित माँ की सिंदूरी मूर्ति बरबस ही भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है। मुख्य मंदिर के अलावा पर्वत के नीचे छोटी बम्बलेशवरी देवी का मंदिर भी बना हुआ है। इस मंदिर का निर्माण उन भक्तों के लिए किया गया जो वृ़द्ध होने के कारण पर्वत पर नहीं चढ़ सकते। वहीं यहाँ हनुमान जी के दो मंदिर स्थित हैं। जिनमें से एक नीचे छोटी बम्बलेशवरी देवी के मंदिर के समीप है तथा दूसरा ऊपर पर्वत पर मुख्य मंदिर के पास है। मुख्य मंदिर के मार्ग में नवनिर्मित शिवजी के मंदिर की दीवारों पर बनी सर्पो की विभिन्न मुद्राओं की आकृति काफी आकर्षक है। यहाँआने वाले श्रद्धालु मुख्य मंदिर जाने से पूर्व शिव मंदिर के दर्शन अवश्य करते हैं।

माँ कामख्या मंदिर- कामख्या

मंदिर गुवाहाटी शहर के पश्चिम क्षेत्र में स्थित नीलांचल पहाड़ी जिसे कामगीरी पर्वत भी कहा जाता है पर स्थित है। नवरात्रि के त्यौहार में यहाँ सबसे ज्यादा भीड़ होती है। उसके अलावा यहाँ मनसा पूजा, अंबूबाची मेला भी बड़े घूमधाम से मनाया जाता है।

नीलांचल पवर्त पर स्थित ये प्राचीन मंदिर हिन्दु धर्म के 51 शक्तिपीठ में से एक है। मान्यता है कि यहाँ दसों महाविदया एक साथ रहती है। मूलत: यह मंदिर शक्ति की देवी माँ कामख्या को सर्मपित है। इसके अलावा पर्वत पर माँ तारा, माँ भैरवी, माँ भुवनेशवरी एवं माँ घटकारणी के मदिंर भी स्थित हैं।
प्राचीन काल से ही यह मंदिर तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध स्थान जिस कारण आज भी इस मंदिर का तंत्र साधना करने वालों के लिए भी विशेष महत्व है।

मैं उम्मीद करती हूँ कि आपको माँ अम्बे के भव्य रूपों की यह नवरात्रि दर्शन यात्रा पसंद आयी होगी।

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